राजमहल की रानी
प्रथम दर्शन
उस गर्मी की शाम को जब सूरज अस्त हो रहा था, मैंने पहली बार उसे देखा। राजमहल के उस बगीचे में जहाँ केवल विशेष अतिथियों को जाने की अनुमति थी, वह अचानक मेरे सामने आ खड़ी हुई। उसकी लाल रंग की लहंगा उसके नाजुक कमर को ऐसे घेरे हुए था जैसे कोई चित्रकार अपनी सबसे सुंदर कृति को सजा रहा हो।
वह मेरी तरफ देखकर मुस्कुराई, और उस मुस्कान में एक ऐसा जादू था जो सीधे मेरे दिल तक पहुँच गया। "तुम यहाँ कैसे?" उसने पूछा, उसकी आवाज़ में एक मिठास थी जो मधु से भी मीठी लग रही थी।
मैं उत्तर देने ही वाला था कि उसने अपनी उंगली मेरे होंठों पर रख दी। उस स्पर्श ने मेरे पूरे शरीर में बिजली सी दौड़ा दी। वह करीब आई, इतनी करीब कि मैं उसकी सांसों की गर्माहट महसूस कर सकता था। "चुप," उसने फुसफुसाया, "हमें यहाँ नहीं देखा जाना चाहिए।"
रात्रि का रहस्य
वह मुझे राजमहल के उन गलियारों में ले गई जिनके बारे में मुझे जानकारी भी नहीं थी। हर मोड़ पर, वह मेरे करीब आती जा रही थी, जैसे कोई शिकारी अपने शिकार को लुभा रहा हो।
जब हम उसके कक्ष में पहुँचे, उसने दरवाजा बंद करते हुए कहा: "आज रात तुम मेरे हो, राजकुमार। कोई नहीं जान पाएगा कि तुम यहाँ हो।"
उसने धीरे से अपनी चुनरी उतारी, और फिर अपने बालों के पिन। एक-एक करके उसके सभी आभूषण फर्श पर गिरते चले गए। मैं मंत्रमुग्ध सा देखता रहा - यह कोई सपना तो नहीं?
वह मेरे पास आई और मेरे कुर्ते के बटन खोलने लगी। "मैं तुम्हारे बारे में सुनती आई हूँ," उसने कहा, "लेकिन किसी ने मुझे यह नहीं बताया कि तुम इतने सुंदर हो।"
प्रातः का सच
सुबह की पहली किरण ने हमें एक दूसरे में लिपटे हुए पाया। उसकी त्वचा मेरी त्वचा से चिपकी हुई थी, हमारे शरीर एक दूसरे की गर्मी में लीन थे।
वह जागी और मुझे देखकर मुस्कुराई। "तुम्हारी आँखें सुबह के उजाले में और भी सुंदर लगती हैं," उसने कहा, अपनी उंगलियों से मेरे चेहरे को छूते हुए।
मैंने उसे अपनी बाँहों में भर लिया, इस डर से कि कहीं यह सपना टूट न जाए। लेकिन वह असली थी, और यह पल भी। जैसे ही मैं उसे चूमने ही वाला था, दूर से किसी के आने की आहट सुनाई दी...
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